Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 116, Verse 38
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 116, verse 38 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 116 · श्लोक 38
संस्कृत श्लोक
उन्निद्रपुष्पपटुपाण्डुरपुष्पखण्डा मन्दारभाण्डविशिखण्डिकरण्डकच्छाः ।
ग्रामाः प्रपातजलजालविलासवाद्या वल्गद्गुहागहनगीतजना जयन्ति ॥ ३८ ॥
हिन्दी अर्थ
फूले हुए किंशुकवृक्षों से भरी हुई इस वनपंक्ति से धूम्र के समान काले-काले
ऊपरी भाग से युक्त मेचधूम के समान निकलते हैं । किंशुक के फूल अंगारों की भाँति निकलते हैं
ओर पक्षी तथा भँवर बुझे हुए अंगारों की तरह निकलते हैं