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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 116, Verse 43

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 116, verse 43 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 116 · श्लोक 43

संस्कृत श्लोक

आसन्नपीतघनघर्घरमेघनादनृत्यच्छिखण्डिनवताण्डवविप्रकीर्णैः । ग्रामाः कलापिकुलकोमलबर्हखण्डैः प्रोड्डीनचन्द्रकमणिप्रकरा जयन्ति ॥ ४३ ॥

हिन्दी अर्थ

यह चन्द्रमा की चाँदनी प्रदोषकाल में नाच रहे त्रिभुवन संहारकारी शिवजी का अइहास है या भुवनरूपी महाभवन की चूने आदि से होनेवाली सफेदी है या आकाशरूपी समुद्र के दुग्धरूपी जल का स्वच्छ प्रवाह है