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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 116, Verse 45

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 116, verse 45 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 116 · श्लोक 45

संस्कृत श्लोक

स्वामोदनन्दनवनान्तरसुन्दरेषु संतानकस्तवकहासिनिकुञ्जकेषु । उन्निद्रमन्द्रमधुपाकुलपारिभद्रसान्द्रद्रुमेष्वभिरमे गिरिगह्वरेषु ॥ ४५ ॥

हिन्दी अर्थ

हे अनुपम, ताल के वृक्षों के तुल्य कराल वेतालों के बच्चों से परिवृत ये गुह्यकगण रात्रि के समय शान्तिपाठ, स्वस्तिवाचन आदि मंगलाचरणों से रहित अतएव उत्पार्तो से पीडित आपके शत्रु हूणेश्वर के नगरवासियों को खाने के लिए जाते हे