Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 116, Verse 48
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 116, verse 48 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 116 · श्लोक 48
संस्कृत श्लोक
शिखण्डिन्यो विलासिन्यः पुष्पभारनता लताः ।
अत्र नृत्यन्ति कुञ्जेषु रणनिर्झरपुष्करे ॥ ४८ ॥
हिन्दी अर्थ
पारिजात के वक्षो से विभूषित यह मन्दराचल, जिसका पवन झूल रही अप्सराओं के
गीतों को फैलाता है और जो कहीं पर मणियों की प्रभा से विचित्रस्वरूप हे, अति ऊँचा होने के
कारण आकाश में दिखाई देता है