Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 116, Verse 50
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 116, verse 50 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 116 · श्लोक 50
संस्कृत श्लोक
श्रीमद्वृत्तमहाशयातपहरप्रोच्चैर्गभीराकृते भूभृन्मूर्धसु भूषणं भवसि भो भूमे रसैकास्पदम् ।
एतत्तु क्षपयेन्मनांसि यदिदं मेघ त्वया वर्षता हर्षादूषरपल्वलस्थलतरुष्वम्भोविभागक्रमः ॥ ५० ॥
हिन्दी अर्थ
यहाँ से उत्तर की तरफ प्रसिद्ध कैलासपर्वत पर दृष्टिपात
कीजिये जिसके चारों ओर व्याप्त हुए विस्तृत प्रभाव से आकाश नीचे की तरफ भगवान् शिवजी के
पुत्र श्रीस्वामी कार्तिकिय का मोती के चूर्ण से बना क्रीडागृह जैसा शोभित हो रहा है । ऊपर की
तरफ जैसे क्षीरसागर में डूबा चन्द्रमा शोभित होता है वैसे ही शोभित होता है