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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 116, Verse 53

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 116, verse 53 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 116 · श्लोक 53

संस्कृत श्लोक

अहो नु मेघेन जलं विमुक्तमहो नु तोयेन विपूरिता भूः । अहो नु भूमौ परिपोषितश्च जलैर्धनाढ्यैः प्रणयीव दीनः ॥ ५३ ॥

हिन्दी अर्थ

वर्षा ऋतु में कलियों की विकसित पंखुडियों से सुशोभित वनस्थलिया में छायादार वृक्षो के झुण्डों तथा हरी-हरी दूब से आच्छन्न मैदानो से मनोहर जंगलों में एवं कतारबद्ध खड़े फलवाले पेड़ों से भरे हुए गाँवों मे लक्ष्मी अतिशय शोभा देखने के कारण रहने के लिए अपने आप बस जाती है