Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 117, Verse 15
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 117, verse 15 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 117 · श्लोक 15
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हिन्दी अर्थ
हे आकाश, तुम अत्यन्त निर्मल, स्वच्छ, चमकदार और उन्नत होने
के कारण उत्तम देवता आदि के उत्तम आधार भी हो, किन्तु अवकाशयुक्त तुम्हारा आसरा लेकर
यह ओले बरसानेवाला बादल लोगों को ओलों से घायल करता है, उसके दोष से तुम अत्यन्त
अपकृष्ट हो गये हो