Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 117, Verse 20
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 117, verse 20 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 117 · श्लोक 20
संस्कृत श्लोक
महतां कुलपद्मानां गुणसौन्दर्यशालिनाम् ।
प्रभावं नास्ति संख्यातुं वासुकेरपि शक्तता ॥ २० ॥
हिन्दी अर्थ
रात्रि आकाश
को अन्धकाररूपी वस्त्र से, चन्द्रमा कर्पूर के प्रवाह के तुल्य शुभ्र किरणों से, दिन सूर्य की धूपरूपी
नूतन वस्त्र से, द्युलोक रात्रि के तारा समुदायरूपी पुष्पराशियों से ओर सब ऋतुएँ मेघ, बरफ
तथा जलरूपी पुष्पों से भूषित करती हैं ये सभी मिलकर समय और कलात्मक त्रिभुवन के
स्वामी सूर्य ओर चन्द्रमा के विहारस्थल आकाश को भूषित करते हैं