Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 117, Verse 42
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 117, verse 42 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 117 · श्लोक 42
संस्कृत श्लोक
हे हंस मद्गुबककाकशरारुसारे मा त्वं सरस्यविरतं कुरु वासमेकः ।
आपद्यपीह समशीलवयोवचोभिः श्रेयःफला भवति संगतिरात्मवर्गैः ॥ ४२ ॥
हिन्दी अर्थ
स्वर्गस्थ चन्द्रनगरके
उपवनों के भाग जैसे ये मनमोहक पर्वतीय गाँव, जिनमें अरनों का जल अविरत कलकलध्वनि कर
रहा है, चौगिर्द ताड के पेड खिले हैं, जिनका आकाश स्वाभाविक उल्लाससे युक्त ओर पल्लवां से
लदी हुई लताओं के वितानं से आच्छन्न है ओर जिनमें आसपास के ऊँचे-ऊँचे साल के पेड़ों पर
मेघमण्डल लटका है, चन्द्रामृत को चूआनेवाले अश्वत्थ से युक्त ब्रह्मलोक को मात करते हैं