Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 117, Verse 5
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 117, verse 5 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 117 · श्लोक 5
संस्कृत श्लोक
कणाणुमुक्ताजलतापटालं तीरेषु सिंहे सुलतासुटालम् ।
तरङ्गनिर्धूतशिलोग्रकच्छं महीतलाकाशमनन्तकच्छम् ॥ ५ ॥
हिन्दी अर्थ
जो युद्ध में सामने आये हुए योद्धा
को धर्म के अविरोध से योद्धा के अनुरूप (~) मारता है, वही शूर स्वर्गगामी होता है, दूसरा
नहीं