Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 118, Verse 2
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 118, verse 2 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 118 · श्लोक 2
संस्कृत श्लोक
बक हंस इवाभासि सरःस्थो मद्गुसौहृदम् ।
नृशंसत्वं च वाणीं च त्यक्त्वा हंसो भव स्फुटम् ॥ २ ॥
हिन्दी अर्थ
इन्द्रनील के पीठे के सदृश भ्रमरो, सारस, क्रौच आदि पक्षियों ओर
ब्राह्मणों द्वारा सेवित उक्त सरोवर भूमि में आया हुआ ब्रह्मा का घर-सा मालूम पड़ता है जिसमें
खिले हुए ओर ऊपर ऊठे दण्डवाले विविध कमलों के कोशस्थलों में बैठे और उनकी शोभा को
धारण करनेवाले राजहंस बैठे हुए हैं