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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 118, Verse 21

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 118, verse 21 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 118 · श्लोक 21

संस्कृत श्लोक

लसत्कलापजलदाः पश्य नृत्यन्ति बर्हिणः । धुन्वानाः पिच्छकान्तीन्दुं प्रावृषः पोतका इव ॥ २१ ॥

हिन्दी अर्थ

भगवान्‌ श्रीहरि के वक्षःस्थल में निवास करनेवाली सकल सौन्दर्यों की अधिदेवी लक्ष्मीदेवी जिस कमल को शोभा के लिए ही अपने हाथों में धारण करती हैं, उसकी इससे बढ़कर दूसरी प्रशंसा क्या हो सकती है ?