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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 118, Verse 23

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 118, verse 23 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 118 · श्लोक 23

संस्कृत श्लोक

चर तृणानि पिबाम्बु वनावनौ कलय विश्रमणं कदलीवने । चकितचातक पावकदूषिता न हि सुखाय भवत्यतिमानिता ॥ २३ ॥

हिन्दी अर्थ

तालाबों मे खिले हुए कमलों की नवोदित शोभा की फूले हुए पारिजात वन से तुलना नहीं की जा सकती, तारों से भरे हुए आकाश से और अनेक चन्द्रविम्बों से भी उनकी बराबरी नहीं हो सकती है