Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 118, Verse 7
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 118, verse 7 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 118 · श्लोक 7
संस्कृत श्लोक
अत्र जले हिमहेलाः पश्यैता अपहरन्ति सितपद्मान् ।
इच्छसि ता अनुगन्तुं नाहं ते वल्लभा व्रजामीति ॥ ७ ॥
हिन्दी अर्थ
अपने बच्चों के लिए घोंसलों मे ले जाये जा रहे कमल-
नाल, कमल-कन्दरूपी ग्रासो के भार से थके कन्धेवाले हंसों से, जो काल द्वारा इकडे किये गये
चन्द्रबिम्ब जैसे है, धिरकर मन्दता, सुगन्धि, शीतलता आदि गुणों से रहित केवल वायुयुक्त भी यह
वायु से जिसके शरत्काल के मेच छिन्न-भिन्न किये गये ऐसे आकाश की तरह शोभ रही है यदि यह
मन्दता, सुगन्धि, शेत्य आदि गुणों से सम्पन्न वायु से युक्त होता तो फिर इसकी शोभा का क्या
ठिकाना था ?