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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 119, Verse 27

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 119, verse 27 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 119 · श्लोक 27

संस्कृत श्लोक

क्वचिच्चितिक्षोभकृतप्रकाशं क्वचिन्महाकेशकृताब्दवृन्दम् । क्वचिच्च रक्ताक्तधरावितानं नक्तं स्तनत्त्वभ्रमिवास्तशैलम् ॥ २७ ॥

हिन्दी अर्थ

ही समापन होता है जैसे कि आत्मज्ञानशून्य मूर्खो का जन्मयापन होता है, यह भाव है