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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 119, Verse 4

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 119, verse 4 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 119 · श्लोक 4

संस्कृत श्लोक

आ एष शिखरे मेघः स्मराश्व इव संयुतः । विद्युल्लताविलासिन्या वलितो रसिकः स्थितः ॥ ४ ॥

हिन्दी अर्थ

दुर्जनो ने लोकलिसा से स्वार्थत्िद्धि करना जल के कओ से सीखा; ये प्रकारांतर से कहते हैं इसी तरह (जलकौए के समान ही) अपनी स्वार्थसिद्धि के लिए लोगों का गला घोटना उचित है, इस बात को दर्शता हुआ जलकौआ मेरा गुरु बन गया है, यों दुष्टजन कौए की प्रशंसा करते हैं