Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 12, Verse 35
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 12, verse 35 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 12 · श्लोक 35
संस्कृत श्लोक
यतः कुतश्चिदन्विष्य सविरागममत्सरम् ।
जनं सज्जनमात्मज्ञं यत्नेनाराधयेद्बुधः ॥ ३५ ॥
हिन्दी अर्थ
संसारसागर से पार हो जाने की इच्छा रखनेवाले
विद्वान् को चाहिये कि वह जहाँ-कहीं से विरक्त, मत्सररहित, आत्मज्ञानी सज्जन पुरुष को
यत्नपूर्वक ढूँढ़कर उसकी आराधना करे