Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 120, Verse 2
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 120, verse 2 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 120 · श्लोक 2
संस्कृत श्लोक
कदलीकन्दलीस्वच्छगुच्छाच्छोटनपण्डिताः ।
विविधा वायवो वान्ति पुष्पकेसरमण्डिताः ॥ २ ॥
हिन्दी अर्थ
प्रिया के आगे उससे वर्णित विरह कथा का वर्णन करने के लिए भ्रूमिका बोधता ह /
हे प्रिये, तुम्हारे वियोग की अवस्था में मेरी एक दिन हुई आश्चर्यपूर्ण दुर्घटना को सुनो । तुम्हारे
समीप अपना समाचार भेजने के लिये दूत का विचार करते-करते विचारमग्न हुए मैंने यह कहा