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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 126, Verses 1–7

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 126, verses 1–7 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 126 · श्लोक 1-7

संस्कृत श्लोक

श्रीराम उवाच । अनन्तरं मुनिश्रेष्ठ कुर्वन्तः किं विपश्चितः । आसंस्तेषु दिगन्तेषु सद्वीपाब्धिवनाद्रिषु ॥ १ ॥ श्रीवसिष्ठ उवाच । श्रृणु किंवृत्तमेतेषां तात तत्र विपश्चिताम् । तालीतमालमालाढ्यद्वीपाद्रिवनचारिणाम् ॥ २ ॥ क्रौञ्चद्वीपगिरेरेको विपश्चित्पश्चिमे तटे । कटेनाद्रितटे पिष्टः करिणा कमलं यथा ॥ ३ ॥ द्वितीयो नभसा नीतो रक्षसा विक्षताङ्गकः । निक्षिप्तो वाडवे वह्नौ तत्र भस्मत्वमागतः ॥ ४ ॥ तृतीयस्त्रैदशं देशं नीतो विद्याधरेण वै । गतोऽप्रणामकुपितशक्रशापेन भस्मताम् ॥ ५ ॥ चतुर्थश्चतुरं गच्छन्कुशद्वीपगिरेस्तटे । दुर्वारेण नदीकच्छे मकरेणाष्टधा कृतः ॥ ६ ॥ इति ते पञ्चतां प्राप्ता दिङ्मुखेष्वाकुलाशयाः । क्षये चतुर्षु चत्वारो भूपाला लोकपालवत् ॥ ७ ॥

हिन्दी अर्थ

एक सौ चौबीसवाँ सर्गं समाप्त एक सौ पचीसवाँ सर्ग इस विपत्ति में विपश्चितो का आपस मेँ एक दूसरे का उपकार करना तथा जीवन्मुक्तो की सर्वत्र अर्थक्रिया का वर्णन | विभिन्न दिशाओं में भ्रमण कर रहे विपश्चितों की आपस में एक दुसरे की खोज और विपत्तियों में परस्पर सहायता करता है या नहीं इस प्रकार की श्रीरामचन्द्रजी की आशंका को इंगित से ताड़कर उसका निराकरण करने की इच्छा करनेवाले श्रीवस्निष्ठजी पहले पूर्व विपश्चित्‌ की शान्तमय वर्ष में हरीतकी वृक्षतारूप आपत्ति में पश्चिम विपश्चित्‌ द्वारा अनुग्रह किया गया, यह कहते हैं। श्रीवसिष्ठजी ने कहा : शान्तमय नाम से प्रसिद्ध वर्ष में जलधारावाले पर्वतपर हरीतकी के वन में हरीतकी -वृक्ष बने हुए कैंचीरूप यन्त्र के सदृश भूमि के अन्दर के पाषाण सम्बन्धी जल को जड़ों से पीते हुए पूर्व विपश्चित्‌ को पश्चिमी विपश्चित्‌ ने उसके वृतान्त को जानकर, वहाँ आकर, शाप देनेवाले मुनि को प्रसन्न कर उससे दी गई विद्यारूपी आरी से वृक्षता का मानों छेदन कर सत्तर वर्षो में वृक्षता से मुक्त किया। पश्चिम दिशा को प्रस्थित विपश्चित्‌ को, जो शिशिर वर्ष में पिशाचपति के शाप से पाषाणता को प्राप्त हुआ था, दक्षिण दिशा को प्रस्थित हुए विपश्चित्‌ ने वहाँ पहुँचकर गोमांस आदि के प्रयोग से पिशाचपति को प्रसन्न कर शीघ्र मुक्त किया । अस्ताचल पर्वत के परले पार स्थित शिवनामक वर्ष में गोरूप पिशाची द्वारा वृषभरूप पिशाच बनाये गये पश्चिम विपश्चित्‌ को दक्षिण विपश्चित ने वहाँ पहुँचकर मुक्त किया । यहीं पर (शाकद्वीप में) क्षेम वर्ष मे आम्बिकेय पर्वत पर दक्षिण विपश्चित्‌ यक्षता-को प्राप्त हुआ पश्चिम विपश्चित्‌ से प्रसादित यक्षपति ने उसे मुक्त किया । शाकद्वीप में ही वृषक वर्ष में केसर नामक पर्वत पर पूर्वं विपश्चित्‌ सिंहता को प्राप्त हुआ, पश्चिम्‌ विपश्चित्‌ ने आकर उसे छुडाया। श्रीरामचन्द्रजी ने कहा : मुनिवर, एक देश में स्थित योगी तीनों कालों में चारों ओर व्याप्त होकर सब कर्म (अनुग्रह, निग्रह आदि) कैसे करते हैं, इसमें कृपया उपपत्ति आपको कहनी चाहिये