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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 127, Verse 26

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 127, verse 26 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 127 · श्लोक 26

इस समूह का संस्कृत श्लोक-संरेखण अभी परिष्कृत किया जा रहा है; नीचे इसका हिन्दी अर्थ दिया गया है।

हिन्दी अर्थ

उक्त लोकालोक पर्वत पचास हजार योजन ऊँचा है, उसका एक हिस्सा सूर्य के प्रकाश से लोगों के व्यवहार से परिपूर्ण रहता है और दूसरा हिस्सा लोकव्यवहार से शून्य रहता है