Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 128, Verse 8
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 128, verse 8 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 128 · श्लोक 8
संस्कृत श्लोक
तद्ब्रह्माण्डकवाटं तु तृणं तृणमणिर्यथा ।
धत्ते वारि स्वभावेन नित्यं कल्पकरत्नवत् ॥ ८ ॥
हिन्दी अर्थ
इसी कारण तत्-तत् वादियो की भूमि का निरन्तर नीचे गिरना, ऊपर जाना, घूमना, तैरना आदि
कल्पनाएँ भी तत्- तत् वादियों की बुद्धि मे अवच्छिन्न चित्सत्ता से सत्य ही है, इस आशय से उपसंहार
करते हैं।
कोई वादी मानते हैं पृथ्वी गुरु होने से निरन्तर महाकाश में गिरती है। आकाश के अध:प्रदेश
की अवधि न होने से इसका गिरना कहींपर भी नहीं रुकता, बहुत बड़ी होने से उसका पतन हमारे
दृष्टिगोचर नहीं होता है । ज्योतिश्चक्र (ज्योतिर्मण्डल), जो दोनों ओर से मेरुपर्वत पर जुड़े हुए
दक्षिण और उत्तर ध्रुव में वेधा है, पृथ्वी के साथ ही गिरता है । वह अत्यन्त हलका होने के कारण
गिरने से ही अनादिकाल से घूमता है । कोई लोग यह मानते हैं कि “योऽप्सु नावं प्रतिष्ठितां वेद
प्रत्येव तिष्ठति इस श्रुति के अनुसार भूमि का आधार सागर है यानी भूमि सागर पर आधारित है।
उसमें कहींपर न बँधी हुई भूमि नाव की नाईं घूमती रहती है और प्रलयकाल में सागर में डूब जाती
है एवं सृष्टि के समय जल में फेंकी हुई तुम्बी की तरह ऊपर आ जाती है। दूसरे लोग यह मानते
हैं कि भूमि के ऊपर, नीचे और अगल-बगल अगाध जल ही जल है । उसके अन्दर छिद्रों में भूमि
के सात लोक हैं, जिनका कि मध्यभाग वायु से पूर्ण है। उनके मध्यभाग में स्थित वायु के अतीव
हलका होने के कारण जलमग्न तुम्बी के समान सातों लोक सदा ऊपर की ओर जाते हैं। और लोग
मानते हैं कि भूगोल के चारों ओर आकाश ही आकाश है। उसके असीम और गुरू होने के कारण
मेरुपर्वत पर स्थित देवताओं की दृष्टि से दक्षिण भाग ही अधोभाग है, अतः दक्षिण से ही वह सदा
गिरता हे । दूसरे असुरपक्षीय वादी पातालदेश को ही ऊर्ध्वप्रदेश मानते है । देवता जिसे ऊर्ध्वदिशा
मानते हैं, उसको वे अपनी कपोल-कल्पना से अधोभाग मानकर गुरुतर भूमि का उत्तर से ही
गिरना निश्चित करते हैं । इसी रीति से पूर्वं ओर पश्चिम से भूमि के गिरने की कल्पना करते हैँ ।
कोई वादी कहते हैं ज्योतिर्मण्डल (सौरपरिवार) नहीं घूमता, किन्तु पृथिवी ही अपनी जगह पर
घूमती हे । भूमि का चलना हम लोग नहीं देख पाते। जैसे नाव में सवार हुए लोग पेड़ों का चलना
देखते हैं वैसे ही हम ज्योतिर्मण्डल का घूमना देखते हैं । अन्य लोग कहते हैं भूमि ही सबकी अपेक्षा
नीची है । उसके चारों ओर स्थित लोगों की दृष्टि से उनके शिरःप्रदेश से उपलक्षित सकल दिशाएँ
ऊर्ध्वं दिशाएँ ह । उन दिशाओं में गुरुतावश जिस दिशा में पृथिवी के पतन की संभावना की जाय
वह दिशा ही निश्चित नहीं है, विनिगमक कोई न होने से पृथ्वी कहींपर भी नहीं गिरती है, अपनी
जगह पर ही निश्चल रहती है । पूर्वोक्त सभी वादियों की स्वबुद्धि में अवच्छिन्न चित् की सत्ता से
सब कुछ सत्य हे । वास्तविक में कुछ भी सत्य नहीं है, यह अभिप्राय है