Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 130, Verses 2–4
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 130, verses 2–4 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 130 · श्लोक 2-4
संस्कृत श्लोक
श्रीवसिष्ठ उवाच ।
येनैवाभ्युदिता यस्य तस्य तेन विना गतिः ।
न शोभते न सुखदा न हिताय न सत्फला ॥ २ ॥
विपश्चितोऽग्निः शरणं तत्प्रवेशादयं मृगः ।
पूर्वरूपमवाप्नोति निर्मलं कनकं यथा ॥ ३ ॥
करोम्येतदहं सर्वं दृश्यतां दर्शयामि वः ।
अग्निप्रवेशं हरिणः करोत्येषोऽधुना पुरः ॥ ४ ॥
हिन्दी अर्थ
श्रीवसिष्ठजी ने कहा : उनमें से एक
विपश्चित् चिरकाल से अभ्यस्त वासना से विवश होकर विविध शरीरों से भिन्न-भिन्न ह्वीपों में
भ्रमण करता हुआ उत्तर विपश्चित् की पद्धति को (ब्रह्माण्डों के जलादि आवरणों के लंघन द्वारा
शबल ब्रह्म में करोड़ों संसारों में भ्रमणरूप पदवी को) प्राप्त हुआ परमाकाशरूपी खोखले में उसी
प्रकार (उत्तर विपश्चित् की ही तरह) ब्रह्माण्ड के आवरणों को एक के बाद एक छोड़कर करोड़ों
संसारो को देखता हुआ आज भी उसी अवस्था में स्थित है । उनमें से “दूसरा यानी पूर्व को प्रस्थित
विपश्चित् चन्द्रमा के समीप में स्वयं अभ्यस्त चन्द्रमृग में अतिशय प्रेमरूप आसक्ति के कारण
चन्द्रमा के साथ प्रतिभास अत्यन्त भ्रमण कर रहे अपने शरीरों से युक्त होकर उनका त्याग कर चुकने
के बाद आज मृग बनकर पर्वत पर स्थित है