Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 130, Verses 47–53
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 130, verses 47–53 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 130 · श्लोक 47-53
इस समूह का संस्कृत श्लोक-संरेखण अभी परिष्कृत किया जा रहा है; नीचे इसका हिन्दी अर्थ दिया गया है।
हिन्दी अर्थ
श्रीवाल्मीकिजी ने कहा : उस सभा में यह बात सुनकर रामचन्द्रजी के आश्चर्य की सीमा न रही।
उन्होने मृग को लाने के लिए झुण्ड के झुण्ड बालकों को भेजा | इसके बाद बालकों द्वारा लाया गया वह
भोला-भाला मृग विशाल सभा में प्रविष्ट हुआ । उस तगड़े ओर प्रसन्न मृग को सब सदस्यों ने आँखें
फाड-फाड कर देखा । वह अपने काले शरीर में सफेद बिन्दुओं से तारा रूपी विन्दु ओं से युक्त आकाश
की शोभा मात कर रहा था, दृष्टिपातरूपी नील कमलो की लगातार वृष्टि से सुन्दरियों का भी तिरस्कार
कर रहा था तथा उसके दर्शनों के लिए लालायित सभा का भी अनादर करने वाले सुन्दर सभय
कटाक्षवीक्षणों से सभा के खम्भों पर जड़े हुए मरकतों की हरे रंग की कान्तियों को हरे तिनके समञ्चकर
खाने के लिए इधर-उधर चंचलता से दौड़ रहा था। कान, नेत्र ओर गर्दन ऊपर उठाकर अपने अस्थिर
अनिवार्य चंचल वेगो से सभी सभासदों को देखने की उत्सुकता से या भागने की आशंका से व्याकुल कर
रहा था। उस मृग को देखकर राजा, मुनि ओर मन्त्रियों के साथ सभी लोग भगवान की माया अनन्त हे,
यों कहते हुए आश्चर्यसागर में डूब गये सब सभासदां के अवलोकनरूपी घनी नीलकमल की वर्षा से
नील से रगे हुए से ओर सभाभवन के खम्भ में जड़े हुए रत्नों की किरणों से व्याप्त मृग को देख रही वह
भरी सभा, जिसके सबके सब सदस्य आश्चर्यमय वृत्तान्त के पुनः पुनः आस्वादन से अति विस्मययुक्त
थे, चित्रलिखित कमलिनी-सी (कमल से पूर्ण तालाव-सी) हो गई थी