Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 130, Verse 6
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 130, verse 6 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 130 · श्लोक 6
संस्कृत श्लोक
दध्यावनिन्धनं वह्निं ज्वालापुञ्जमयात्मकम् ।
तद्ध्यानेन सभामध्याज्ज्वालाजालं समुद्ययौ ॥ ६ ॥
हिन्दी अर्थ
श्रीवसिष्ठजी ने कहा : हे श्रीरामचन्द्रजी प्राणी की खूब अभ्यास को प्राप्त
हुई वासना देश, काल और कर्म वश कोमल और अत्यन्त परिपाक से बद्धमूल होती है। कोमल वासना
भेद को प्राप्त होती है पर परिपाकवश बद्धमूल वासना भिन्न नहीं होती है