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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 133, Verse 6

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 133, verse 6 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 133 · श्लोक 6

संस्कृत श्लोक

एवंविधां हृदि मनाक्कलयामि यावत्तावत्पपात सहसा नभसो विवस्वान् । कल्पान्तवातपरिवृत्तपितामहाण्डपृष्ठावपातघनघोषजुषा जवेन ॥ ६ ॥

हिन्दी अर्थ

उसके बाद दूसरे जन्म मे आश्वयपूर्ण जगत्‌ के अन्तदर्शनका वर्णन करता है । दूसरे जन्म में मैंने दूसरा जगत्‌ देखा, जो ज्योतिश्चक्र से (सौरपरिवार से) शून्य था तथा केले के छिलके के समान गर्भ के गर्भ में स्थित एक से स्वप्रकाश लोगों से आकीर्ण था