Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 137, Verses 8–9
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 137, verses 8–9 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 137 · श्लोक 8,9
संस्कृत श्लोक
तत्रस्थो दूरविक्षिप्तं तयैवाहृतवानहम् ।
चेतः स्वहृदयं सायं रुचेव रविरातपम् ॥ ८ ॥
वेदनेरणया प्राणस्ततश्चित्तान्वितो मया ।
शरीराद्रेचितो बाह्ये सौरभं कुसुमादिव ॥ ९ ॥
हिन्दी अर्थ
चमक रही उस अणुता ने बढ़कर अपनी वृद्धि की (फुलाव
की) भावना करते हुए चक्षु आदि इन्द्रियों का अनुभव किया फिर वे इन्द्र्यो शरीर में संलग्न हैं, ऐसा
अनुभव किया। आगे चक्षु आदि ने अपने स्वभाव से शब्द, स्पर्श आदि गुणों का आधार आधेय सम्बन्धवाला
भूतमय जगत्, स्वप्न के नगर के समान, देखा