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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 138, Verse 1

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 138, verse 1 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 138 · श्लोक 1

संस्कृत श्लोक

तापस उवाच । गन्तुमेवं विचार्याहं ततस्तत्संविदैकताम् । प्रवृत्तश्चौत्तमाब्जेन सौरभेणेव सौरभम् ॥ १ ॥

हिन्दी अर्थ

एक सौ छत्तीसवाँ सर्गं समाप्त एक सौ सैंतीसवाँ सर्ग व्याध के पूछने पर मुनि का धारणा के अभ्यास से परकायप्रवेश द्वारा देखे गये उसके स्वप्न का वर्णन । व्याध ने कहा : हे मुनिजी महाराज, यदि हिंसादि कार्य दुःखका हेतु है तो दुःख के विनाश में कारणभूत व्यवहार, जो न कठोर है ओर न कोमल है, कैसा है ? कृपया उसे मुझसे कहिये