Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 138, Verse 59
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 138, verse 59 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 138 · श्लोक 59
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हिन्दी अर्थ
इसलिए यथास्थित जगत् के साथ स्वप्न, जाग्रत ओर सुषुप्ति ये तीनों अवस्था
तुरीय में अन्तर्भूत हैं, वास्तव में ये कुछ भी नहीं हँ