Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 138, Verses 6–18
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 138, verses 6–18 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 138 · श्लोक 6-18
संस्कृत श्लोक
वदनप्रतिबिम्बे द्वे दर्पणप्रतिबिम्बिते ।
यथा भातस्तथा भाते मिश्रिते ते जगच्चितम् ॥ ६ ॥
तैलवद्भाति कोशस्थं यच्चेतनतिलद्वये ।
तस्मिञ्जगद्द्वयं तत्तत्तथा भाति विमिश्रितम् ॥ ७ ॥
संविद्द्वितयकोशस्थे मिश्रिते अप्यमिश्रिते ।
ते उभे जगती भाते समे क्षीरजले यथा ॥ ८ ॥
निमेषाद्दृष्टमात्रेण सा तत्संविन्मया ततः ।
सकलैवात्मतां नीता परिमित्येव संविदा ॥ ९ ॥
ऋतुर्ऋत्वन्तरेणेव सरितेवाल्पिका सरित् ।
वातेनामोदलेखेव धूमलेखेव वार्मुचा ॥ १० ॥
एकत्वेनाशु संवित्तेर्ययौ मे जगदेकताम् ।
दुर्दृष्टेर्द्विवपुश्चन्द्रः सुदृष्टेरेकतामिव ॥ ११ ॥
ततो मे तच्चितिस्थस्य स्वं विवेकमनुज्झतः ।
अल्पीभूतः स्वसंकल्पस्तत्संकल्पस्थितिं गतः ॥ १२ ॥
तच्चित्तवृत्त्यैव ततो बाह्यमालोकयंस्ततः ।
अभुञ्जि तद्दिनाचारं तत्तद्धृदयमत्यजन् ॥ १३ ॥
ततो यदृच्छयैवासौ शनैर्निद्राकुलोऽभवत् ।
पद्मः सायमिवापीय पयो भुक्त्वान्नमुच्छ्रमः ॥ १४ ॥
प्रसृतं दिग्निकुञ्जेषु रूपालोकक्रियाकरम् ।
संजहार बहिश्चित्तं सायमर्को रुचिं यथा ॥ १५ ॥
सह चित्तेन तास्तस्य समस्तेन्द्रियवृत्तयः ।
हृत्कोशमविशञ्छन्नाः कूर्मस्येवाङ्गसंधयः ॥ १६ ॥
मुद्रिता हृदयाकारास्त आसंश्चक्षुरादयः ।
लोष्टरूपा मृतावेव लिपिकर्मार्पिता इव ॥ १७ ॥
अहं तच्चित्तवृत्त्यैव सहसोन्नम्य तत्स्थितः ।
तच्चित्तानुविधायित्वात्तत्तद्धृदयमाविशम् ॥ १८ ॥
हिन्दी अर्थ
द्वारा उसके स्वप्न आदि का पुनः पुनः अवलोकनकर अन्वय-व्यतिरेक से बार-बार परीक्षा करके तथ्य
तक पहुँचकर उनका समाधान किया था, यह विस्तारपूर्वक कहने के लिए तीसरे प्रश्न का उत्तर देते हुए
मुनि उपक्रम करते हैं।
मुनि महाराज ने कहा : हे साधो, पहले आरम्भअवस्था में जबकि मेरा विवेक कोमल था, मेरे मन में
भी अपने-आप न जाने कहाँ से ऐसा ही वितर्कं आकाश में बादल के टुकड़े के तुल्य उठा । उसके बाद
उसका पता लगाने की इच्छा से मैंने योग-क्रिया का खूब अभ्यास किया, जिससे मैँ अनायास परकाय
प्रवेश कर सकूँ। पद्मासन बोधकर सब प्राणियों की आत्मभूत सर्वप्रसिद्ध संवित् में ही स्थिर हुआ यानी
चित्तसमाधि लगाई जैसे सूर्य सायंकाल के समय बिखरे हुए अपने प्रकाश को अपने मण्डल की कान्ति
से बटोरता है वैसे ही उक्त संवित् में समाधिस्थ हुआ मैं उसी संवित् से दूर विक्षिप्त अपने चित्त को
अपने हृदय में लोटा लाया मैंने प्राण के अन्तर्गत चित्त की प्रेरणा से योगशास्त्र मे प्रसिद्ध प्रयत्न से, जो
प्राण के साथ जीव के बाहर निकलने में सहायक है, जीवोपाधि चित्त के साथ प्राण को शरीर से बाहर
रेचक द्वारा निकाला । बाहर आकाश में स्थित जीवोपाधि चित्त से युक्त बाहर रेचित अपने प्राणवायु को
मैंने अपने सामने स्थित किसी जीव के (छात्र के) मुख के अग्रभाग में स्थित प्राण में मिला दिया । मेरे
प्राण से संमिश्रित उस प्राणी का जो प्राण था, उसने मुझे उसके हृदय के भीतर वैसे ही पहुँचाया जैसे कि
भालू बिल में मुँह डालकर मुँह के वायु से अपने आहारभूत साँप को जवर्दस्ती बाहर खींच मुँह में डाल
कर मारकर अपने पेट में पहुँचाता है । उसके हृदय में प्रविष्ट होने के बाद प्राणरूपी घोडे से परस्पर मिले
हुए उक्त दोनों प्राणों का अनुगमन कर मैं उसके देह मध्य में प्रविष्ट हो अपनी बुद्धि से संकट में फस गया
जैसे बाह्य प्रदेश में सिंचाई के लिए छोटी बडी बहुत-सी नहरों का जाल बिछा रहता है वैसे जीवगृह में
रसवाहिनी बहुत सी नाडियों का जाल फैला हुआ था । उक्त जीवगृहरूपी शरीर पसलीरूपी पिंजडे,
प्लीहा, यकृत, रुधिर आदि के पिण्डों से ठीक वैसे ही संकटाकीर्ण था जैसे कि भाँड़े, बर्तन आदि के
अम्बारों से घर संकटाकीर्ण होता है जैसे ग्रीष्म ऋतु में तपी हुई लहरों से सागर व्याप्त रहता हे वैसे ही
उदराग्नि मेँ उबलने से शल् शल् शब्द कर रहे गरम गरम सब अवयवो से जीवगृह शरीर घिरा था। जीवन
के लिए चित्त और प्राण आदि वायुओं द्वारा निरन्तर खीचे गये बाहर के नूतन नूतन शेत्य के नासिका के
अग्रभाग के भीतर प्रवेश होने के कारण वह जीवगृह चेतनामय था । रुधिर को नाड़ियों द्वारा बाँटनेवाले
अन्नरस, कफ आदि के बहाव से वह अत्यन्त बिछलर था, उसमें चारों ओर अन्धकार ही अन्धकार था,
गर्मी भी कम न थी, अतएव नरक के तुल्य महान् संकटाकुल था । बहत्तर हजार नदियों में कहींपर
रुधिर, रस, कफ ओर पित्त के उदय से कहींपर विभिन्न अंगों में चिपकने से तथा कहींपर संचार के
सौकर्य से व्यक्त और कहींपर मार्ग में रुकावट होने से व्यक्त न हुए प्राण आदि वायुओं की लीलाओं से
सात धातुओं की सत्ता ओर विनाश की विषमतावश वह जीवमन्दिररूप शरीर आनेवाले रोगोंकी स्वप्न
आदि में सूचना देता था