Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 138, Verse 61
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 138, verse 61 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 138 · श्लोक 61
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हिन्दी अर्थ
उक्त का ही पुनः वर्णन करते हुए प्रकरण का उपसंहार करते है ।
अद्वितीय ब्रह्म में सृष्टि के जन्मकारणों का संभव न होने से सृष्टि अतिरिक्तरूप से उत्पन्न नहीं
होती, किन्तु चित् के जगताकार चेतनने ही स्वभावतः स्वयं सर्ग संवित् वैसे ग्रहण की है जैसे कि जल
द्रवता ग्रहण करता है