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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 139, Verse 22

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 139, verse 22 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 139 · श्लोक 22

संस्कृत श्लोक

ततोऽन्धस्यस्य जीर्णेऽन्तर्नाडीमार्गे स्फुटे स्थिते । प्राकृते स्पन्दिते प्राणे सुषुप्तं तनुतां ययौ ॥ २२ ॥

हिन्दी अर्थ

वह स्वार्थ मे आसक्त रहे, फिर भी उसे मन, इन्द्रिय आदि दूसरों का कार्य भी करना चाहिये, सो क्यो नहीं करता, इसपर कहते हैं। चूँकि निरतिशय आनन्दस्वरूप स्वार्थसत्ता में (सुषुप्ति में) यही निरतिशयानन्दस्वरूप विकसित होता है, विक्षेपदुःख का लेश भी उस समय नहीं रहता, इसलिए उसके अन्दर स्वार्थमात्र परकृत्य नहीं करता है