Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 14, Verses 25–26
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 14, verses 25–26 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 14 · श्लोक 25,26
संस्कृत श्लोक
वहतीयमविच्छिन्ना चिरायैवं तरङ्गिणी ।
तावदृश्यसरित्प्रौढा रूढारूढे च तत्पदे ॥ २५ ॥
इति मायेयमादीर्घा प्रसृता प्रत्ययोन्मुखी ।
सत्यावलोकमात्रातिविलयैकविलासिनी ॥ २६ ॥
हिन्दी अर्थ
हे विद्याधर, जब तक आत्मसाक्षात्कार नहीं होता, तब तक प्रबल यह
दृश्यरूप नदी अविच्छिन्नरूप से चिरकाल तक बहती ही रहती है ओर चौथी भूमिका से लेकर छठी
भूमिकाओं तक उस ब्रह्मपद के अर्धरूढ तथा अर्धं अनारूढ़ होनेपर बहुत दूर तक लम्बी-चौडी
फैली हुई यह माया-मायारूप से अनुभव में आ जाती है । एकमात्र विलास में ही तत्पर रहनेवाली
यह माया केवल सत्य परमात्म साक्षात्कार से विलय को प्राप्त होती हे