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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 141, Verses 24–32

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 141, verses 24–32 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 141 · श्लोक 24-32

इस समूह का संस्कृत श्लोक-संरेखण अभी परिष्कृत किया जा रहा है; नीचे इसका हिन्दी अर्थ दिया गया है।

हिन्दी अर्थ

इसके पश्चात्‌ तटवर्ती पर्वत के शिखर पर पहुँचकर थक जाने के कारण किसी मुनि के आश्रम में जब मैंने विश्राम लिया तब मुझे खूब नींद आई । उसके अनन्तर उस वासना से युक्त हुए मैंने अपने ओज में स्थित होकर भी सुषुप्ति के बाद प्राप्त हुई निद्रा के अन्दर उस कल्पान्त को जैसा उक्त प्राणी के ओज मेँ स्थित होकर देखा था वैसा ही देखा चिरकाल तक उस दुगुने दुःख का अनुभव कर व्याकुल हुआ मैं जब जागा तो मैंने उस प्राणी के हृदय में स्थित उसी पर्वत शिखर को देखा । इसके बाद दूसरे दिन मैने वर्ह पर भगवान्‌ भास्कर के उदय से मनोहर भुवन को लोक, आकाश, भूमि ओर पर्वतो के साथ देखा । द्युलोक, पृथिवी, वायु, आकाश, पर्वत, नदियाँ ओर दिशाएँ ये सबके सब जैसे शाखा से पत्ते उत्पन्न होते हैँ वैसे ही मेरे चित्त से उत्पन्न हुए | इसके पश्चात्‌ पूर्वानुभूत विषय को भूलकर पूर्वोक्त प्रकार से दृष्टिपात हुए भूलोक में तत्‌-तत्‌ पदार्थो से व्यवहार करने के लिए मैं प्रवृत्त हुआ । आज मुझे पैदा हुए सोलह वर्ष हो गये हैं, ये मेरे पिता हैं, यह मेरी माँ है, यह मेरा घर है, ऐसी मेरी व्यवहारप्रतिभा उत्पन्न हुई । मेने एक छोटा-सा गाँव देखा, उसमें एक ब्राह्मणाश्रम देखा, एक घर देखा, वहाँपर किसी आश्रम में मेरा कोई बन्धु हुआ । इसके बाद ग्राम्य घर में बन्धु- बान्धवों के साथ निवास कर रहे मेरे एकके बाद एक दिन-रात बीतने लगे । वहाँ जाग्रत आदि अवस्थाओं का अनुभव कर रहे मेरा वही ग्राम आदि बाह्य विकास यथार्थ-सा हो गया