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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 143, Verse 18

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 143, verse 18 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 143 · श्लोक 18

संस्कृत श्लोक

जाग्रत्स्वप्नार्थसार्थस्य संविदश्च न भिन्नता । अस्त्यप्रतिघरूपायाः प्रकाशालोकयोरिव ॥ १८ ॥

हिन्दी अर्थ

द्वैत और ऐक्य से शून्य की द्वैत ओर ऐक्य से स्थिति क्या कहीं देखी गई है ? ऐसा प्रश्न उठनेपर कहते हैं। जैसे एक काल प्रलय और सृष्टि दोनों रूप है अथवा जैसे बीज अंकुर, पौधा, पेड़, डाली, पत्ती, पल्लव और फलस्वरूप से स्वयं ही स्थित होता है वैसे ही ब्रह्म भी सर्वात्मक-द्वैत-ऐक्य से युक्त है