Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 143, Verse 23
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 143, verse 23 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 143 · श्लोक 23
संस्कृत श्लोक
ब्रह्मणो हृदि सर्गोऽयं हृदि ते स्वप्नपूर्यथा ।
कार्यकारणता तत्र तथास्तेऽभिहिता यथा ॥ २३ ॥
हिन्दी अर्थ
तब तो प्राक्तन कर्मो के अनुसार ही मन मनन करता है, अन्यथा नहीं करता, इसलिए अन्तोगत्वा
कर्मही संसार का बीज ठहरता है, जिनका कर्म निश्शेषरूप से नष्ट हो चुका हो उनका समस्त मननत्याग
सिद्ध होता है ऐसा समझ रहा व्याध उक्त कर्म किनका है, किनका नहीं है, यों पूछता है।
भगवन्, यहाँ प्राक्तन कर्म किनका है और किनका नहीं है । जिनका प्राक्तन कर्म नहीं है, उनके
प्राक्तन कर्म के बिना भी मनन और मननत्याग कैसे होते हैं ?