Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 143, Verses 26–27
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 143, verses 26–27 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 143 · श्लोक 26, 27
संस्कृत श्लोक
आकाश एव कचनं यच्चित्ते स्वात्मरूपिणी ।
नियतं संनिवेशत्वात्तदन्तः सर्ग उच्यते ॥ २६ ॥
या संविद्रव्यवस्थास्ते हृदि संकल्पपत्तने ।
सैषा स्वभावसंसिद्धिः कार्यकारणतार्थजा ॥ २७ ॥
हिन्दी अर्थ
कर्मशून्य वे महात्मा ब्रह्मा आदि कर्मवान के आत्मा कैसे हैं, ऐसी आशंका उपस्थित होनेपर उस
समय किसी का भी कर्म नहीं है, ऐसा कहते हैं।
सृष्टि के आरम्भ में यहाँ किसी का भी कर्म नहीं रहता । सृष्टि के आरंभ में ब्रह्म ही इस तरह
सृष्टिरूप से विकास को प्राप्त होता है। जैसे सृष्टि के आरम्भ में परब्रह्मरूपी ब्रह्मा आदि भासित होते
हैं वैसे ही सैकड़ों और हजारों अन्यान्य जीव भी भान को प्राप्त होते हैं