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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 143, Verse 6

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 143, verse 6 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 143 · श्लोक 6

संस्कृत श्लोक

यत्स्थितं ब्रह्मणि ब्रह्म कृतास्तेनैव सत्यता । स्वभावैकात्मिकाः संज्ञा देहसर्गक्षयादिकाः ॥ ६ ॥

हिन्दी अर्थ

इस प्रकार अपने और दुसरे के स्वप्नो को देखने से अन्वय-व्यतिरेकगतः परिक्षित शब्दार्थरूप जगत्‌ का बाधदुष्टि से त्रैकालिक असत्ता ही तत्व है, ओर परिशिष्ट अधिष्ठानभूत, ब्रह्मद्ष्टि से ब्रह्म ही तत्त्व है इस आशय से श्रीमुनि उत्तर देते हैं। मुनि ने कहा : हे व्याध, सृष्टि का कारण कूटस्थ है या विकारी है ? कूटस्थ तो कारण हो नहीं सकता, कारण कि व्यापार न कर रहे कूटस्थ में क्रियाजनकत्वरूप कर्तृत्वका सम्भव नहीं हे, कार्यसम्बन्धयोग्य भी वह नहीं है, उसके उदासीन से अतिरिक्त रूप का निरूपण कहीं नहीं हे ओर उसमें उदासीनातिरिक्त स्वभाव की उत्पत्ति भी श्रुत या दृष्ट नहीं हे, अतएव उसका कारण होना तो किसी प्रकार संभव नहीं है । विकारी अनिर्णीत नाना अंशो से घटित होता हे । उसका कौन-सा अंश कारण है ? घटादि विकारयुक्त मिट्टी के पिण्ड से हट रहा पिण्डाकार कारण है या आ रहा घटाकार कारण हे, अथवा दोनों आकारो से अनुगत मिट्टी आदि आकार कारण है ? प्रथम तो कारण हो नहीं सकता, क्योकि जो अपनी भी रक्षा करने में असमर्थ हो, कार्यकाल में रह न सके और कार्य के अर्थ हुए व्यापार का जो आधार न हो उसके कारण होने की सम्भावना तक नहीं हे । दूसरा भी कारण नहीं हो सकता, क्योकि घट से अन्य कार्यका निर्देश नहीं हे, अतः स्व में स्वकारणता का प्रसंग हो जायेगा । तीसरा भी कारण नहीं हो सकता, क्योकि मिड़ी आदिरूप अनुगताकार को अक्रियाशील मानो तो कूटस्थतावश उसमें कारणता नहीं है, क्रियाशील मानो तो घटों की अनन्तता का प्रसंग प्राप्त होगा अर्थात्‌ सदा घटोत्पत्ति होगी, क्योकि मिट्टी आकारमात्र सदा अस्तित्व हे । कार्योत्पादन में समर्थ को सहकारी की आवश्यकता न होने से एक साथ सब कार्यो की प्राप्ति होगी, पिण्ड, घडा, कपाल, चूर्ण आदि की युगपत्‌ प्राप्ति होगी । अन्य सहकारी के सम्बन्ध की व्यवस्था से व्यवस्था हो जायेगी, ऐसा यदि कहो तो बताओ कि अन्य सहकारी का संबंध मिट्टी-जन्य है या अन्यजन्य है ? यदि मिट्टी जन्य मानो तो घट आदि के समान वह भी मिट्टीआकार मात्र से ही उसी समय उपपाद्य होगा । ऐसी स्थिति में जैसे मिट्टीआकारमात्र को कारण मानने पर घटादि की उत्पत्ति युगपत्‌ होगी, यह दोष दिया था सहकारिसम्बन्ध के भी मिट्टी आकार मात्रजन्य मानने में घटादि की उत्पत्ति युगपत्‌ ही होगी, क्योंकि मिट्टी आकारमात्रजन्य सहकारिसम्बन्ध के सदा रहने से घटादि की युगपत्‌ उत्पत्ति का प्रसंग ज्यों का त्यों रहा । इसलिए सहकारी के सम्बन्ध से कोई व्यवस्था न हुई । यदि अन्य सहकारिसम्बन्ध मिट्टी से भिन्न से जन्य है, तो मिट्टी भिन्न भी "समर्थस्य कालक्षेपायोगः' इस न्याय से युगपत्‌ सर्वकार्यजनक है, इसलिए प्रस्तुत सहकारिसम्बन्ध को भी उसने अपनी उत्पत्ति के वाद ही पैदा किया, अतः घटादि की युगपत्‌ उत्पत्ति प्रसक्ति ज्यों की त्यों ही रही । यदि कहो मिडी से भिन्न भी अन्य सहकारिसम्बन्ध को उत्पन्न करने के लिए सहकारिविशेष की अपेक्षा करता है, ऐसी स्थिति में अन्य सहकारिसम्बन्ध कादाचित्क (कभी होनेवाला) ही होगा, अतः वह व्यवस्थापक हो सकेगा। तब भी मिट्टी से भिन्न में सहकारिविशेषसम्बन्ध जिससे उत्पादनीय है, उससे वह "समर्थस्य कालक्षेपायोगः' इस न्याय से अपनी उत्पत्ति के बाद ही पैदा किया गया, अतः प्रस्तुत अपेक्षित उपार्जनसम्पत्ति से घटादिकी युगपत्‌ उत्पत्ति का निवारण होना असम्भव है । पिण्ड, कपाल, घट, चूर्ण आदि बहुत से कार्योत्पादन में समर्थ मिड़ी आदि आकार के किसी एक कार्य की जनकता में कोई विनिगमक नहीं हे, सहकारिसम्बन्ध की विनिगमकता का खण्डन तो हो ही चुका है, इसलिए सब कार्यो की युगपत्‌ प्रसक्ति होगी यदि इसके परिहार के लिए एक कार्योत्पत्ति को दूसरी कार्योत्पत्ति मेँ प्रतिबन्धक मानो तो परस्पर प्रतिबन्धक -प्रतिवन्ध्यता से कुछ भी उत्पन्न नहीं होगा, इससे सर्ग आदि निष्कारण हैं, यह पक्ष ही अवशिष्ट रहा । अतः सर्ग शब्द ओर अर्थ सर्वथा है ही नहीं, यह तत्त्व निर्णीत हुआ