Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 144, Verses 2–5
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 144, verses 2–5 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 144 · श्लोक 2-5
संस्कृत श्लोक
खे दृष्टिभासां स्फुरणं यादृशं तादृशं जगत् ।
विपर्यस्यत्यविरतमबोधाल्लक्ष्यते स्थिरम् ॥ २ ॥
यद्यथा पुरसंस्थानं चिरैरेति तदन्यताम् ।
जगदप्येवमनिशं वार्यावर्तविवर्तवत् ॥ ३ ॥
भूम्यम्ब्वम्बरशैलादि भवत्यसदिदं क्षणात् ।
तस्मिन्नेव क्षणोदन्तैर्युगकल्पाभिधाः कृताः ॥ ४ ॥
यथा स्वप्नेऽखिलामम्बुसंक्षोभात्प्रलयभ्रमाः ।
दृश्यते कारणं तत्र श्रूयतामनुभूयताम् ॥ ५ ॥
हिन्दी अर्थ
सकल पारलौकिक सुख भी पण्डित को प्राप्त होनेवाले आत्मसुखरूपी महासागर में जलकण से
भी लघु है, ऐसा कहते हैं।
गन्तव्य परम धामरूपी ब्रह्म को जाननेवाले आत्मज्ञानी पण्डित जिस परम गति को प्राप्त होते हैं,
उसके सामने इन्द्र का महान् ऐश्वर्य जीर्ण-शीर्ण पत्ते के टुकड़े की तरह नगण्य है। पाताल में, भूतल में
और स्वर्ग में जो कुछ सुख अथवा ऐश्वर्य मैं देखता हुँ, वह सब मिलकर भी पाण्डित्य की बराबरी नहीं
कर सकता | सत्- शास्त्र के विचार से उत्पन्न हुए ज्ञान से परिपूर्णं पण्डित की परमार्थ वस्तुरूप दृष्टि
स्वात्मा में वैसे ही आह्वाद का अनुभव करती है जैसे कि शरत् काल की पूर्णिमा के अखण्ड निर्मल
मण्डलवाले चन्द्रमा में, जिससे बादलों का कोई सम्पर्क न हो, लोगों की दृष्टि आह्वादित होती है। जैसे
ज्ञान होनेपर माला में कल्पित सर्पता तुरन्त शान्त हो जाती है वैसे ही विद्वान् की दृष्टि में यह अज्ञानरूप
सर्गादि दृश्य क्षणभर में ब्रह्म बन जाता हे