Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 144, Verse 40
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 144, verse 40 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 144 · श्लोक 40
संस्कृत श्लोक
अनानात्वेऽपि नानात्वे ब्रह्मण्यब्रह्मरूपिणि ।
अनाकारेऽपि साकारे कचत्यप्रतिघं प्रति ॥ ४० ॥
हिन्दी अर्थ
संस्काररूप से विहित और निषिद्ध के आचरण धर्म ओर अधर्म कहलाते हैं; संस्कार-पुँज ही मन
है, चिदाभास से व्याप्त मन ही जीव है और जीव प्राणादि चेष्टाप्रधान होने से कमत्मिा है ओर वही
अपनी वासना के अनुसार देह आदि का संकल्प करता हुआ जीवात्मा सा बनता है, इसलिए ये चित् के
प्रतिभास विशेष ही हैं, इस आशय से दूसरे प्रश्न का उत्तर मुनि कहते हैं।
धर्म-अधर्म, वासना, कर्म, आत्मा, जीव यह सब पर्यायवाची शब्दों की राशि की कल्पना है, किन्तु
अर्थभेद इनमें तनिक भी नहीं है ॥ ३ ७॥
चिदाकाश ने कोई दृश्यदेहादिप्रपंच भी है यों चित्त द्वारा कल्पित चिदाभासरूपसे अपने चिदाकाश
स्वरूप में स्वयं ये धर्म, अधर्म आदि, इनके फल सुख, दुःख आदि नाम रखे हैं ॥ ३ ८॥
जीवात्मा जैसे स्वप्न और मनोरथ में पहले से अविद्यमान देह को विद्यमान-सा जानता है वैसे ही
मरकर भी अविद्यमान आकाशरूप देह को चित् होने से स्वयं चिदाकाश में विद्यमान-सा जानता है ॥ ३ ९॥
मरने के बाद का समय और देह आदि की कल्पना स्वप्न के समान ही है, ऐसा कहते हैं।
मरे हुए को परलोकबुद्धि स्वप्न के समान अपने-आप भासित होती है मरकर वह चिर कालतक
परलोक को देखता है, किन्तु स्वप्न के समान उसमें सत्यता नहीं है