Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 144, Verse 65
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 144, verse 65 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 144 · श्लोक 65
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हिन्दी अर्थ
हे व्याध, तुम मन से पूर्वं दिशा ओर पश्चिम दिशा को चिरकाल तक जाते हो, वहाँपर दृष्ट, श्रुत
ओर अनुमित पदार्थो का लाभ करते हुए अपने को जानते हो, वहाँ संवित्रूप तुम्हारा नाश है ही
नहीं, इससे सिद्ध हुआ कि संवित् कहींपर भी विनाशिनी है ही नहीं