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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 145, Verse 11

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 145, verse 11 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 145 · श्लोक 11

संस्कृत श्लोक

उत्सवान्मङ्गलाकीर्णांल्लीलालोलाङ्गनागणान् । भक्ष्यभोज्यान्नपानश्रीपरिपूर्णगृहाजिरान् ॥ ११ ॥

हिन्दी अर्थ

जीवों के ये जगत्‌संस्कार क्या देह में हैं या चित्‌ में हैं यदि चित्‌ में हैं तो वे सबके लिए दृश्य होगे । यदि देह में हैं तो देह का नाश होनेपर उनका भी विनाश हो जायेगा, ऐसी आशंका होनेपर कहते हैं । ये जगत्संस्कार न तो केवल चित्‌ के हैं और न देह के ही हैं, किन्तु तत्‌-तत्‌ विभिन्न दृश्याकार के परिणाम को धारण कर रही तथा चिदाभास की व्याप्ति से चित्स्वभाववाली बुद्धि के ही संस्कार आदि नाम किये गये हैं। बुद्धि के ही प्रभाव से प्रभावशाली देहप्रतिमा से संस्कार आदि अलग नहीं हैं