Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 145, Verse 26
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 145, verse 26 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 145 · श्लोक 26
संस्कृत श्लोक
कृशानुकर्कशानर्कांश्चक्रधाराशितत्विषः ।
दावदाहविषावेशविपरीतरसाकरान् ॥ २६ ॥
हिन्दी अर्थ
इसलिए
जहाँपर असीम अविनाशी चिदाकाश निरन्तर स्थित है वहाँपर वह जगत्भान स्थित है, जो कि उसके
अवयवी की तरह उससे अभिन्न है, यह सिद्ध हुआ