Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 146, Verse 1
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 146, verse 1 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 146 · श्लोक 1
संस्कृत श्लोक
व्याध उवाच ।
अनन्तरं मुनिश्रेष्ठ तस्मिन्हृदि तदोजसि ।
स्थितस्य तव किं वृत्तं नामतो भ्रान्तिरूपिणि ॥ १ ॥
हिन्दी अर्थ
मुनिजी ने कहा : हे व्याध, यह जीव बाहरी इन्द्रियों से बाहर ही स्वप्न को जानता है तथा भीतरी
इन्द्रियो से आभ्यन्तर स्वप्न को जानता है, लेकिन बाहर और भीतर के व्यवहार की सिद्धि के लिए
अत्यन्त तीव्र वेगवाली बाह्य ओर आभ्यन्तर इन्द्रियों से बाह्य ओर आभ्यन्तर-दोनों स्वप्नं को
जानता है
सर्ग सन्दर्भ
एक सौ चौवालीसवाँ सर्ग समाप्त एक सौ पैंतालीसवाँ सर्ग कफ, पित्त ओर वायु से भरे हुए जीव के ओज मेँ (तेजोधातु में ) कल्पित स्वप्नभेदों का तथा इन्द्रियों से बाहरी भ्रमों का वर्णन ।