Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 148, Verse 25
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 148, verse 25 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 148 · श्लोक 25
संस्कृत श्लोक
कदाचित्सत्यता स्वप्ने कदाचिच्चाप्यसत्यता ।
अभावान्नियतेरेव काकतालीयमेव तत् ॥ २५ ॥
हिन्दी अर्थ
हे व्याध, तुम्हारी बुद्धि भी सत्संग रहित होने से अव भी शान्ति को
नहीं प्राप्त होती है किन्तु आगे कहे जानेवाले तपस्या, शरीरवृद्धि, मरण, जन्मान्तर, राज्य आदि
के कष्ट द्वारा द्रैत को समझकर बड़ी कठिनता से साधना के अभ्यास और परिश्रम से ज्ञान प्राप्त
करके शान्ति को प्राप्त हो जायेगी