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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 15, Verse 17

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 15, verse 17 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 15 · श्लोक 17

संस्कृत श्लोक

तदभावाज्जगन्नास्ति चित्त्वं जगदभावतः । शिष्टं निर्वाणमेवातः शान्तमास्स्व यथासुखम् ॥ १७ ॥

हिन्दी अर्थ

अहंभावादिरूप बीज के अभाव से यह जगत्‌ भी नहीं है और इस जगत्‌ के अभाव से कैवल्यरूपी निर्वाण ही चिन्मात्र अवशिष्ट है । अतः हे विद्याधर, शान्त ब्रह्मस्वरूप होकर तुम सुखपूर्वक बैठे रहो