Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 151, Verses 40–43
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 151, verses 40–43 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 151 · श्लोक 40-43
इस समूह का संस्कृत श्लोक-संरेखण अभी परिष्कृत किया जा रहा है; नीचे इसका हिन्दी अर्थ दिया गया है।
हिन्दी अर्थ
तुमने जीव के हृदय में प्रविष्ट होकर वहाँ यह
विस्तारयुक्त त्रिभुवन देखा था, जिसका पृथिवीलोक और स्वर्गलोक महान् उदर है । इस रीति से
जब तुम परकीय शरीर के अन्दर स्वप्न देखने में व्यग्र थे तब तुम्हारे शरीर में और उस महावन में
सोये हुए उस प्राणी के शरीर में, जिसके अन्दर तुम प्रविष्ट थे, भयंकर आग लग गई। उस आग का
क्या कहना था, धुएँ से धुमैले मेघरूपी वस्त्रों को ओढा हुआ आकाश ही उसका चँदवा था, चमक रहीं
और जोर से घूम रही लाठियों के चककरों से उसने अनेक सूर्यमण्डल और चन्द्रमण्डल बना डाले थे।
नीले आकाशखण्ड और दिशाओं की आचरण द्वारा रक्षा करनेवाले जले हुए मेघोंपर भस्म से भरे हुए
धूम्र के मेघरूपी काले कम्बलों द्वारा, उक्त अग्नि ने आकाश को आच्छन्न कर दिया था