Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 152, Verse 1
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 152, verse 1 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 152 · श्लोक 1
संस्कृत श्लोक
मुनिरुवाच ।
इत्युक्त्वा स मुनिस्तत्र तूष्णीं स्वशयने निशि ।
आसीद्विस्मयतश्चाहमथाऽऽसं प्रोह्यमानवत् ॥ १ ॥
हिन्दी अर्थ
अन्य मुनि ने कहा : मुने, वहाँपर वे दोनों शरीर, आश्रम, नगर, वे सब घर और सब पेड सबके सब
अग्नि द्वारा सूखे हुए तिनके के समान झटपट राख बन गये
सर्ग सन्दर्भ
एक सौ पचासवाँ सर्ग समाप्त एक सौ इक्यावनवाँ सर्ग मुनि के आश्रम के साथ पूर्वोक्त दोनों शरीर भस्म कर चुकी अग्नि ओर भस्म की वायु द्वारा शान्ति तथा स्वप्न में जाग्रत् की स्थिति का वर्णन।