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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 154, Verses 20–21

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 154, verses 20–21 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 154 · श्लोक 20,21

इस समूह का संस्कृत श्लोक-संरेखण अभी परिष्कृत किया जा रहा है; नीचे इसका हिन्दी अर्थ दिया गया है।

हिन्दी अर्थ

इसलिए उसका शरीर, मेरा शरीर आदि का अस्तित्व न होने के कारण यह सब आदि अन्त शून्य चित्‌ की आभारूप आकाश ही है कर्ता, कर्म, और करण से विहीन क्रमशून्य यह चिद्घन ही हे । यह घट, वस्त्र, दीवार आदि सब चिदाकाश का स्फुरण है । अतः घट, पट आदि स्पष्ट आकार धारण करनेवाले कहाँ से हो सकते हैं