Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 155, Verse 2
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 155, verse 2 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 155 · श्लोक 2
संस्कृत श्लोक
न विशश्राम चेतोऽस्य स्वाभ्यासेन विना पदे ।
आसीदुद्भ्रान्त इव स प्रोह्यमान इवार्णवे ॥ २ ॥
हिन्दी अर्थ
अद्वैत होने के
कारण न मेरा कोई आधार है ओर न मैं ही किसी का आधार हू, अभिमानरहित, आश्रयविहीन, निज
चित्स्वभाव में स्थित, स्वयं शान्त सर्वथा उदित सृष्टिरूप मैं स्थित हूँ