Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 156, Verses 53–54
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 156, verses 53–54 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 156 · श्लोक 53,54
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हिन्दी अर्थ
मुनिजी ने कहा : हे व्याध, अवश्यंभावी अर्थ को कोई कदापि
टाल नहीं सकता, क्योकि वह आधुनिक प्रयत्नं से नष्ट नहीं हो सकता । जैसे पुरुष को अपने शरीर में
भी बाएँ अंग को दाहिना ओर दाहिने को बायाँ तथा सिर को पैर और पैरों को सिर बनाकर अदल-बदल
करने की सामर्थ्य नहीं है वैसे ही उसे भावी अर्थ को अन्यथा करने की भी सामर्थ्य नहीं हे